भोजशाला- कमाल मौला मस्जिद पर हाईकोर्ट का फैसला राजनीतिक, उम्मीद है सुप्रीम कोर्ट इसे पलट देगा- शाहनवाज़ आलम

नयी दिल्ली, 15 मई 2026. कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव शाहनवाज़ आलम ने कहा है कि भोजशाला – कमाल मौला मस्जिद को मध्य प्रदेश हाईकोर्ट द्वारा मंदिर घोषित कर दिया जाना न्यायिक कम राजनैतिक फैसला ज़्यादा है. क्योंकि कथित एएसआई रिपोर्ट पर मुस्लिम पक्ष द्वारा उठाए गए सवालों का संज्ञान ही हाईकोर्ट द्वारा नहीं लिया गया. वहीं इस मामले में पूजा स्थल अधिनियम 1991 की भी अवहेलना की गई है. उन्होंने उम्मीद जतायी है कि सुप्रीम कोर्ट हाईकोर्ट के इस फैसले को पलट देगा.



शाहनवाज़ आलम ने जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा कि पूजा स्थल अधिनियम स्पष्ट तौर पर कहता है कि 15 अगस्त 1947 तक धार्मिक स्थलों का जो भी चरित्र था वो यथावत रहेगा. इसे चुनौती देने वाले किसी भी प्रतिवेदन या अपील को किसी न्यायालय, न्यायाधिकरण (ट्रिब्युनल) या प्राधिकार (अथॉरिटी) के समक्ष स्वीकार ही नहीं किया जा सकता.



शाहनवाज़ आलम ने कहा कि इंदौर हाईकोर्ट का यह फैसला 12 दिसंबर 2024 को तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना, जस्टिस संजय कुमार और जस्टिस केवी विश्वनाथन के उस आदेश की भी अवमानना है जिसमें उन्होंने अदालतों को मस्जिदों और मंदिरों के दावों पर कोई भी याचिका स्वीकार करने, लंबित मामलों में कोई भी आदेश जारी करने पर रोक लगायी थी.



उन्होंने कहा कि यह आश्चर्य की बात है कि निचली अदालतें सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवमानना कर रही हैं और सुप्रीम कोर्ट अपनी अवमानना पर चुप्पी साधे हुए है. जिससे साबित होता है कि ऐसे फैसले सत्ताधारी गिरोह के राजनीतिक हितों को पूरा करने के लिए दिए जा रहे हैं.

कांग्रेस नेता ने कहा कि सबसे आश्चर्यजनक तथ्य यह है कि मौलाना कमालुद्दीन वेलफेयर सोसायटी की तरफ से कथित एएसआई रिपोर्ट पर यह आपत्ति जताई गई थी कि कमाल मौला मस्जिद- भोजशाला मंदिर की रिपोर्ट में हर जगह एएसआई ने उसे ‘भोजशाला मंदिर’ लिखा. रिपोर्ट की यह भाषा उसकी निष्पक्षता को पहले ही संदिग्ध बना देती है. जिसपर आश्चर्यजनक तौर पर कोर्ट ने कोई संज्ञान नहीं लिया.

वहीं एएसआई पर यह भी आरोप लगा कि उसने मस्जिद पक्ष को न तो उत्खनन के कलर फोटो दिए और जो वीडियो दिए भी वो भी बहुत छोटे थे. जबकि मस्जिद पक्ष ने उन्हें यह उपलब्ध कराने की मांग बारबार की थी. वहीं मस्जिद पक्ष के वकीलों के इस तर्क का भी कोई संतोषजनक जवाब नहीं दिया गया कि एएसआई ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के विरुद्ध जाकर भौतिक उत्खनन क्यों किया जिससे ढांचे के आकार और दिखावट में बदलाव आ गया. वहीं मस्जिद पक्ष की इस दलील पर भी कोर्ट ने संज्ञान नहीं लिया कि खुदाई में एक पटिया के नीचे से प्लास्टिक की बोतलें, पेपर कप और अन्य प्लास्टिक की चीज़ें और वो भी बिल्कुल साफ़ सुथरी कैसे मिल सकती हैं. जबकि ये वस्तुएं 13 वीं या 14 वीं सदी की नहीं हो सकतीं जब इसके बनने का दावा किया जा रहा है.

शाहनवाज़ आलम ने कहा कि मस्जिद पक्ष के इस दावे का भी कोई जवाब हाईकोर्ट ने नहीं दिया कि उसके निर्देश के बावजूद खुदाई में कार्बन डेटिंग प्रणाली का प्रयोग क्यों नहीं किया गया? और सर्वे में पायी गई गौतम बुद्ध की प्रतिमा को एएसआई ने अपनी फाइनल रिपोर्ट में उद्धृत क्यों नहीं किया?


कांग्रेस नेता ने कहा कि मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के फैसले के न्यायिक कम और राजनीतिक ज़्यादा होने का आधार यह भी है मस्जिद पक्ष ने किसी और जगह मस्जिद बनाने के लिए ज़मीन माँगी ही नहीं थी लेकिन हाईकोर्ट ने उसे सरकार से कहीं और मस्जिद बनाने के लिए ज़मीन मांगने का निर्देश दे दिया. उन्होंने कहा कि इस मामले में हाईकोर्ट ने वही किया जो बाबरी मस्जिद मामले में सुप्रीम कोर्ट ने किया था. जिसके उस बेंच के सदस्य और बाद में दुर्भाग्यवश मुख्य न्यायाधीश बने डी वायी चंद्रचूड़ ने अपने एक इंटरव्यू में भी स्वीकार किया था कि वो फैसला उन्होंने तथ्यों के बजाए आस्था के आधार पर दिया था.

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