सहरसा । पूर्व मध्य रेल के समस्तीपुर मंडल में संचालित वाटर वेंडिंग मशीन (WVM) स्टॉल को लेकर बड़ा मामला सामने आया है। मंडल रेल प्रबंधक (वाणिज्य) कार्यालय ने लाइसेंसी पंकज कुमार को लाइसेंस शुल्क एवं वॉटर कंजम्पशन शुल्क बकाया को लेकर कड़ी चेतावनी जारी की है। वहीं दूसरी ओर, पूरे समस्तीपुर मंडल में वाटर वेंडिंग मशीनों पर वाटर मीटर नहीं लगाए जाने से रेलवे को लाखों रुपये के राजस्व नुकसान की आशंका जताई जा रही है।
जानकारी के अनुसार सहरसा रेलवे स्टेशन पर चार वाटर वेंडिंग मशीनें संचालित की जा रही हैं, लेकिन किसी भी मशीन पर वाटर मीटर नहीं लगाया गया है। ऐसे में पानी की वास्तविक खपत का आकलन नहीं हो पा रहा है। स्थानीय सूत्रों के अनुसार एक स्टॉल पर प्रतिदिन लगभग 200 लीटर पानी की खपत होती है, यानी चार मशीनों पर करीब 800 लीटर पानी रोजाना उपयोग हो रहा है। बावजूद इसके अब तक जल खपत मापने की कोई व्यवस्था नहीं की गई है।
रेल प्रशासन द्वारा जारी पत्र में कहा गया है कि लाइसेंस शुल्क निर्धारित समय पर जमा नहीं किया गया तथा जमा राशि की जानकारी विभाग को उपलब्ध नहीं कराई गई। वर्ष 2023 में पंकज कुमार को समस्तीपुर मंडल के विभिन्न स्टेशनों पर वाटर वेंडिंग मशीन स्टॉल आवंटित किए गए थे। इसके तहत लगभग 39.35 लाख रुपये लाइसेंस फीस एवं जीएसटी तथा 4.50 लाख रुपये पीबीजी के रूप में जमा कराए गए थे।
रेलवे के दिशा-निर्देशों में साफ-सफाई, शुद्ध पेयजल, पर्यावरण अनुकूल पैकेजिंग, नियमित सफाई, पेस्ट कंट्रोल एवं वॉटर कंजम्पशन मॉनिटरिंग जैसी व्यवस्थाओं का पालन अनिवार्य बताया गया है। इसके बावजूद विभागीय पत्र में आरोप लगाया गया है कि द्वितीय वर्ष का लाइसेंस शुल्क 159 दिनों की देरी से जमा किया गया तथा वॉटर कंजम्पशन संबंधी नियमों का भी समुचित अनुपालन नहीं किया गया।
रेल प्रशासन ने SBD के Master License Agreement के पैरा 4.2(d) का हवाला देते हुए कहा है कि प्रत्येक वर्ष का लाइसेंस शुल्क निर्धारित अवधि शुरू होने से 15 दिन पूर्व जमा करना अनिवार्य है। देरी होने के कारण विलंब शुल्क भी लगाया गया है।
इस मामले पर सहरसा रेलवे के डीसीआई संजय कुमार ने कहा कि उनका विभाग केवल गुणवत्ता की जांच करता है, जबकि राजस्व और वॉटर कंजम्पशन से जुड़े मामलों की जानकारी डिवीजन स्तर पर उपलब्ध होगी। वहीं क्वार्टर पर कार्यरत कर्मी अमरनाथ कुमार ने बताया कि उन्हें वाटर मीटर लगाने संबंधी जानकारी ही नहीं थी।
अब सवाल यह उठ रहा है कि इतने लंबे समय से बिना वाटर मीटर के पानी की खपत होने से रेलवे को हुए संभावित राजस्व नुकसान की भरपाई कौन करेगा। साथ ही यात्रियों को निर्धारित प्रोटोकॉल के अनुसार शुद्ध पेयजल उपलब्ध कराने की व्यवस्था पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। अब देखना होगा कि रेलवे प्रशासन इस पूरे मामले में क्या कार्रवाई करता है।





